सतयुग दर्शन वसुन्धरा में रामनवमी यज्ञ महोत्सव पर – विशाल शोभा-यात्रा का आयोजन

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Posted by: | Posted on: May 11, 2018

सतयुग दर्शन वसुन्धरा में प्रथम अन्तर प्रादेशिक सांगीतिक प्रतियोगिता का समापन समारोह

( विनोद वैष्णव ) |भूपानी स्थित सतयुग दर्शन संगीत कला केन्द्र द्वारा प्रथम प्रथम अन्तर प्रादेशिक सांगीतिक प्रतियोगिता का आयोजन किया गया जिसमें मु य अतिथि श्री सजन जी मार्गदर्शक सतयुग दर्शन ट्रस्ट, मैनेजिंग ट्रस्टी श्रीमती रेशमा गान्धी जी एवं संगीत कला केन्द्र की चेयरपर्सन श्रीमती अनुपमा तलवार के साथ पंजाब से आए हुए संगीत निर्देशक श्री रामपाल बन्गा, हरजिन्दर अमन एवम मनीष त्रि1खा भी मौजूद रहे। यह प्रतियोगिता हरियाणा प्रदेश के अतिरिक्त दिल्ली के विभिन्न स्कूलों में भी आयोजित कराई गयी। यह प्रतियोगिता समूह गान एवं समूह नृत्य पर आधारित थी। प्रतियोगिता दो क्रम में स पूर्ण हुई। सर्वप्रथम यह प्रतियोगिता हरियाणा के विभिन्न शहरों अ बाला, पानीपत, कुरुक्षेत्र, रेवाड़ी, गुडग़ांव एवं दिल्ली में आयोजित की गई तदोपरान्त वहां पर जो स्कूल प्रथम स्थान पर रहे उन सभी के मध्य एक प्रतियोगिता सतयुग दर्शन स्थित आडीटोरियम में कराई गयी, इस स्थान पर समूह गायन में कुरुक्षेत्र शहर से अग्रसेन स्कूल प्रथम स्थान पर रहा, जिसको ११०००0/- (ग्यारह हजार रुपए) नकद धनराशि एवं ट्राफी, अमबाला शहर से पी के आर जैन स्कूल द्वितीय स्थान पर रहा जिन्हें ५१००/- (पांच हजार सौ रूपए) एवं ट्राफी एवं दिल्ली से यूनीवर्सल स्कूल तृतीय स्थान पर रहा जिन्हें ३०००/- ( तीन हजार रुपए) एवं ट्राफी आदि से सममानित किया गया। वहीं समूह नृत्य में भी बच्चों ने बढ़चढ़कर भाग लिया जिसमें अमबाला शहर से मुरली धरन डी ए वी स्कूल प्रथम स्थान पर रहा, जिसको ११०००/- (ग्यारह हजार रुपए) नकद धनराशि एवं ट्राफी, दिल्ली से भारती प4िलक स्कूल द्वितीय स्थान पर रहा जिन्हें ५१०० (इ1यावन सौ रूपए) ट्राफी एवं रेवाड़ी से उमाभारती प4िलक स्कूल तृतीय स्थान पर रहा जिन्हें २१००/- (इककाीस सौ रुपए) एवं ट्राफी आदि से सममानित किया गया।ट्रस्ट के मार्गदर्शक सजन जी ने अपने स बोधन में सभी प्रतिभागियों को जीत की शुभ कामनाएं देते हुए बताया कि इस प्रतियोगिता के माध्यम से विद्यार्थी अपने मानसिक एवं चारित्रिक निर्माण में संगीत को सहायक बनाएं और एक चरित्रवान इन्सान बनकर दिखाएं।इस अवसर पर विशेष अतिथि के तौर पर प्रसिद्ध भजन गायक श्री कुमार विशु, कुरुक्षेत्र यूनीवर्सिटी की हैड आफ दा डिपार्टमेण्ट प्रौफेसर शुचिस्मिता जी एवं सर्वोदय हास्पीटल के डायरे1टर श्री राजेश गुप्ता धर्म पत्नी अंशु गुप्ता जी के साथ उपस्थित रहे।कार्यक्रम का संचालन प्रेरणा एवं अंकिता नारंग ने किया, कार्यक्रम के अन्त में प्रधानाचार्य दीपेन्द्र कान्त ने सभी अतिथियों, पधारे हुए शिक्षक-शिक्षिकाओं एवं विद्यार्थियों आदि का धन्यवाद ज्ञापन किया। राष्ट्रीय ज्ञान के साथ कार्यक्रम की समाप्ति हुई।

Posted by: | Posted on: March 25, 2018

सतयुग दर्शन वसुन्धरा में परमपद प्राप्ति हेतु आत्मज्ञान की महत्ता

( विनोद वैष्णव ) |सतयुग दर्शन वसुन्धरा में आयोजित राम नवमी यज्ञ महोत्सव के द्वितीय दिवस  सजन जी ने कहा कि अंत:करण/हृदय आकाश की शुचिता के लिए आत्मज्ञान एकमात्र सर्वोत्तम साधन है। आत्मज्ञान से तात्पर्य अपने को पूर्ण रूप से जानने/पहचाने से है। अपने आप से यहाँ आशय सजनों आत्म (स्व) की पहचान वस्तुत: आत्मा/परमात्मा की पहचान से है। इसे आत्मा का स्वरूप ज्ञान या ब्रह्म का ज्ञान यानि आध्यात्मिक ज्ञान भी कहते हैं। यह आत्म-साक्षात्कार व ब्रह्म-साक्षात्कार की स्थिति है। इसी विषय में और स्पष्टता देते हुए उन्होंने कहा कि आत्मा ब्रह्म है तो परमात्मा परब्रह्म है। ब्रह्म से यहाँ तात्पर्य उस सब में बड़ी, परम तथा नित्य चेतनसत्ता से है जो जगत का मूल कारण और सत् -चित-आनंदस्वरूप मानी गई है तथा परब्रह्म से तात्पर्य उस निर्गुण और निरुपाधि ब्रह्म से है जो जगत से परे है। याद रखो जो उस सूक्ष्मतम आद् स्रोत के साथ जुड़, आत्मज्ञान प्राप्त कर लेता है और तद्नुकूल ब्रह्म भाव/सर्व एकात्मा का भाव अपना लेता है वह एकता, एक अवस्था में आ परमात्मा के साथ परमात्मा हो जाता है।आगे  सजन जी ने आत्मज्ञान को और स्पष्ट करते हुए बताया कि आत्मज्ञान, सामान्य ज्ञान से सर्वथा भिन्न है। यह बुद्धि की प्रखरता का नहीं अपितु माया के स्पर्श से दूर आत्मा की निष्कलुषता यानि पावनता का प्रतिबिमब है। यह आत्मा की पुकार है जिसको सुनकर व्यक्ति सन्मार्ग पर चलने के लिए स्वत: प्रेरित होता है और जीवात्मा/परमात्मा के विषय में समयक् ज्ञान प्राप्त कर सदा जाग्रत अवस्था में बना रहता है यानि आत्मसत्ता के प्रति विश्वास रखते हुए हर कार्य विवेकपूर्ण करता है। उन्होंने कहा कि इस उपल4िध के दृष्टिगत आत्मज्ञान प्राप्ति को महत्व दो और सर्वव्याप्त एकात्मा को जानो 1योंकि जो आत्मा को यानि स्वयं को जान जाता है वह उस ब्रह्म (ईश्वर) को यानि सबको पहचान लेता है। इस संदर्भ में उन्होंने स्पष्ट किया कि ब्रह्म ही पूर्ण है अत: उसका ज्ञान ही पूर्ण ज्ञान है। जिस व्यक्ति को इस आत्मतत्व का पूर्णत: ज्ञान हो जाता है वह शीघ्र ही उच्च शिखर (सिद्धि) पर चढ़ जाता है। इंद्रियों के विषय फिर उसे विषतुल्य लगने लगते हैं यानि बाह्य पदार्थों के प्रति उसमें अरूचि उत्पन्न हो जाती है और संसार मिथ्या प्रतीत होने लगता है। इस तरह मन की चंचलता के कारण उत्पन्न विषय-विकारों से सहज ही मुक्ति मिल जाती है और इनके स्थान पर जीवन में संतोष, क्षमा, धैर्य, विनय, शील, सरलता, स्पष्टता, समता आदि गुण प्रकट हो जाते हैं। फलत: जीवन निखर जाता है और व्यक्ति शोक, लोभ, मायाबंधन से सर्वथा छूटकर सच्चिदानंद स्वरूप हो जाता है और अफुर हो परमपद को प्राप्त कर मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है। अन्य श4दों में जब मनुष्य राग और भोग में रूचिशील जीवन जीने के स्थान पर, वैराग्य और त्याग में प्रवृत्त होकर, आत्मा और परमात्मा के स्वरूप और समबन्ध का विचार कर, लौकिक और भौतिक साधनों से भिन्न, आध्यात्मिक उन्नति के साधनों के समबन्ध में अपने मन में विवेचन करता है तो आत्मा और अनात्मा के विवेक ज्ञान द्वारा आध्यासिक/मिथ्याज्ञान से उत्पन्न भ्रमपूर्ण और कल्पित ज्ञान से मुक्ति पा, जीवात्मा और परमात्मा के विषय का समयक् ज्ञान प्राप्त कर, ब्रह्मसाक्षात्कार कर सकता है। इस तरह इस ज्ञान को आत्मसात् करने वाला जीव जीवनमुक्त हो, ब्रह्मभूत हो जाता है। उन्होंने कहा कि इस उद्देश्य पूर्ति्त हेतु सजनों वेद-शास्त्रों में वर्णित अध्यात्मिक विषयों यथा सर्वव्यापी आत्मतत्व/चैतन्य/ब्रह्म/परमेश्वर आदि का मनन एवं चिंतन कर, अक्षर ब्रह्म यानि अपने अविनाशी आत्मतत्व को जानो। इससे श्रेष्ठ अक्षर अव्यय ब्रह्म व उससे परे परब्रह्म का मर्म तो स्पष्ट होगा ही साथ ही अपने च्च्स्व-भावज्ज् (क्षर विराट् विश्व) का रहस्य तथा उसकी कार्यप्रणाली भी स्पष्ट होगी। इस तरह आपके लिए सतत् आत्मनिरीक्षण व आत्मनियंत्रण द्वारा अपने आचार-विचारों व चारित्रिक स्वरूप का निरंतर परिशोधन करते हुए च्च्ईश्वर है अपना आपज्ज् इस विचार पर सुदृढ़ बने रह, इस जगत में अपने समस्त कर्तव्यों का संपादन निर्लिप्तता से करते हुए अकत्र्ता भाव में अडिग बने रहना सहज हो जाएगा और आप आत्मा यानि शुद्ध चैतन्य यानि परम तत्तव का साक्षात्कार कर अपना जीवन सफल बनाने में कामयाब हो जाओगे।

संस्था की प्रबन्धक न्यासी श्रीमती रेशमा गांधी ने बताया कि इस महोत्सव में वसुंधरा के प्रांगण में दिन-रात श्रद्धालुओं का आगमन जारी है। भक्तजनों के रहने, खाने-पीने की समुचित व्यवस्था परिसर में ही की गयी है। श्रीमती रेशमा गाँधी ने बताया कि वे स्वयं समस्त आयोजन पर नजर रखे हुए हैं ताकि किसी भक्तजन को असुविधा का सामना न करना पड़े।

Posted by: | Posted on: March 22, 2018

सतयुग दर्शन वसुन्धरा में रामनवमी यज्ञ महोत्सव पर – विशाल शोभा-यात्रा का आयोजन

 

फऱीदाबाद( विनोद वैष्णव ) | भूपानी स्थित सतयुग दर्शन वसुन्धरा पर दिनांक २१ मार्च २०१८, रामनवमी-यज्ञ, वार्षिक-महोत्सव के अवसर पर हर्षोल्लास के साथ विशाल शोभायात्रा निकाली गई। यह शोभा-यात्रा जैसे ही समभाव-समदृष्टि के स्कूल च्च्ध्यान-कक्षज्ज् में पहुँची तो ट्रस्ट के मार्गदर्शक श्री सजन जी ने कहा कि सजनों आज का दिन हमारे लिए बहुत शुभ है 1योंकि अब शीघ्र ही शुभारंभ होने जा रहा है – उस रामनौमी यज्ञ महोत्सव का जिसके अंतर्गत न केवल सजनों को, समभाव-समदृष्टि की युक्ति अनुसार, जीवन के परम पुरुषार्थ यानि परमपद प्राप्ति की सिद्धि का आवाहन दिया जाता है अपितु अपने-अपने गृहस्थाश्रमों में प्रसन्नता से जीवनयापन करने हेतु, सम, संतोष-धैर्य अपनाकर, सच्चाई-धर्म के निष्काम रास्ते पर चलते हुए किस प्रकार परोपकार कमाना है, उसकी युक्त भी समझाई जाती है।इस यज्ञ महोत्सव की महत्ता के दृष्टिगत उन्होंने, इस यज्ञ उत्सव में देश-विदेशों से उपस्थित हर दुखिया/ सुखिया इंसान से जीवन के परम पुरूषार्थ को सिद्ध कर, इस जीवन-यज्ञ को निर्विघ्न समपन्न करने हेतु अन्दरुनी वृत्ति में नियम-नीतिनुसार परब्रह्मवाचक मूल-मन्त्र आद्-अक्षर का सिमरन करने व बैहरुनी वृत्ति में मन को परेशान करने वाली हर अच्छी व बुरी सोच त्याग, अफुरता में आने की गुजारिश करी ताकि समस्त अंतद्र्वन्द्व व बहिद्र्वन्द्व समाप्त हो जाएं। इस प्रकार उन्होंने सबको अपने मन में असीम शांति का अनुभव करते हुए, आनन्दविभोर हो उस परम आनन्दित अवस्था का अनुभव करने के लिए कहा जिसके अंतर्गत आत्मा-परमात्मा की एकरूपता का एहसास हो जाता है और जीव सहसा ही कह उठता है च्च्हम एक हैं, हम एक हैं, हम एकता के प्रतीक हैं अर्थात् हम ब्रह्म हम…….हम ब्रह्म हाँ। तत्पश्चात् श्री सजन जी ने उपस्थित सजनों को अपने मस्तिष्क व आस-पास के संगी-साथियों को शांति व अफुरता से समवत्र्ती बनने का संदेश देने के लिए कहा ताकि सब के सब समभाव-समदृष्टि की युक्ति अनुसार परस्पर सजन-भाव का व्यवहार करने के प्रति दृढ़ संकल्पी हो जाएं और विचार, सत्त जबान, एक दृष्टि, एकता और एक अवस्था को धारण कर सतयुगी संस्कृति के अनुरूप एक अच्छे व नेक इंसान बन जाएँ। उन्होंने कहा कि इसी हितकारी स्वाभाविक बदलाव से न केवल आपकी शारीरिक-मानसिक स्वस्थता पनप सकती है अपितु आपके मन-चित्त में भी स्थाई प्रसन्नता का संचार हो सकता है।यहाँ उन्होंने जहाँ शारीरिक स्वस्थता के लिए पुरुषार्थ द्वारा निरंतर क्रियाशील व उद्यमी बने रहने की आवश्यकता पर बल दिया, वहीं मानसिक स्वस्थता के लिए वेद-शास्त्रों के अध्ययन द्वारा सकारात्मक उच्च विचार धारण करने को भी नितांत अनिवार्य बताया। उन्होंने सजनों से कहा कि समस्त कारज परिश्रम से ही सिद्ध होते हैं, मात्र इच्छा करने से नहीं यानि परिश्रमी ही जीवन संग्राम में विजयी होता है। अत: ईश्वररूप होने का सच्चा और एकमात्र परम पुरुषार्थ दर्शाओ और इस हेतु अपनी समस्त शक्तियों द्वारा परिश्रम करने में जुट जाओ। शारीरिक स्वस्थता के साथ-साथ मानसिक स्वस्थता के विषय में स्पष्टीकरण देते हुए उन्होंने कहा कि मन-मस्तिष्क की तंदुरुस्ती के लिए वेद-शास्त्रों का अध्ययन कर आत्मिक ज्ञान प्राप्त करना उतना ही जरूरी है जितना शरीर के लिए आहार व व्यायाम। अध्ययन ही हमारे भावों, विचारों व मन को पवित्र कर हमें आनन्द प्रदान करता है, अलंकृत करता है और योग्यता प्रदान करता है। इसके बिना जीवन में आने वाले विषाद यानि दु:खों से निवृत्ति नहीं हो सकती। अत: सत् शास्त्र का विचार कर, सतत् चिंतन, मनन व अ5यास द्वारा, उसमें विदित आत्मिक ज्ञान को व्यवहार में लाओ। ऐसा करने से ही सत्य-असत्य, भले-बुरे की परख कर सकोगे यानि बुद्धि विचार प्रबलता धारण करेगी और विवेकशक्ति का प्रयोग करते हुए केवल सत्य धारणा को ही महत्व देगी। इस तरह अज्ञान अंधकार दूर होगा यानि मन व बुद्धि श्रेष्ठता को प्राप्त हो जाएगी और आप दिव्यता को धारण कर अमर पद प्राप्त करने के योग्य बन जाओगे। सजन जी ने आगे कहा कि ऐसा अद्भुत होने पर ही आपके लिए जगत के सब कार्यव्यवहार यानि अपने समस्त कर्तव्यों का पालन हँस कर करते हुए, अपने मन को प्रभु में लीन रख, निष्कंटक परमार्थ के रास्ते पर बने रहना सहज हो जाएगा। आशय यह है कि यह अदमय पुरुषार्थ दिखाने पर ही आप आत्मविश्वास के साथ, खुद पर आत्मनियन्त्रण रखते हुए, शक्तिशाली होकर, सत्य-धर्म के निष्काम भक्ति-भाव पर डटे रह पाओगे और एक नेक व ईमानदार इंसान की तरह, इस जगत में निर्लिप्तता से विचरते हुए, इसके माया-पाश से आज़ाद हो पाओगे। उन्होने कहा कि जानो यह च्च्विचार ईश्वर है अपना आपज्ज् के सर्वोच्च भाव को आत्मसात् कर, जगत उद्धार हेतु परमात्म स्वरूप में स्थित रहते हुए, समस्त कार्य ईश्वर के निमित्त अकर्ता भाव से करते हुए कर्म फल से मुक्त रहने की अद्वितीय बात होगी। तभी अपने व सबके सजन बन ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट कृति कहलाने का सौभाग्य प्राप्त कर पाओगे और तीनों लोकों में यश-कीर्ति प्राप्त करने के अधिकारी बन एक श्रेष्ठ मानव की तरह यथार्थता में बने रह, यथार्थत: ही जीवन जीते हुए, यथार्थ पद को प्राप्त कर अपना नाम रोशन कर परमानन्द में स्थित हो विश्राम को पाओगे।ट्रस्ट की प्रबन्धक न्यासी श्रीमती रेशमा गांधी ने बताया कि प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी रामनवमी महायज्ञ में काफ़ी सं2या में श्रद्धालु देश-विदेश से समिमलित हुए हैं। यहाँ श्रद्धालुओं के रहने, खाने-पीने व अन्य सुविधाओं का हर प्रकार से समुचित प्रबंध कर दिया गया है। यही नहीं शहर के प्रमुख रेलवे-स्टेशनों एवं बस-अड्डों से भक्तजनों को लाने के लिए विशेष बसों का भी इंतज़ाम किया गया है।